कहनी १३१: प्रार्थना कैसे करनी चाहिए
जब लूका ने अपने सुसमाचार में इन बातों को लिखा, उसने यह सीखने का निश्चय किया कि किस प्रकार यीशु के चेलों को जीवन जीना चाहिए। पहले, यीशु ने दृष्टान्त के द्वारा समझाया। लूका ने कहा और यीशु ने दिया ".... उन्हें यह दिखाएं कि निरंतर प्रार्थना करें और कभी हार ना मानें।"
कहानी इस प्रकार है:
“'किसी नगर में एक न्यायाधीश हुआ करता था। वह न तो परमेश्वर से डरता था और न ही मनुष्यों की परवाह करता था। उसी नगर में एक विधवा भी रहा करती थी। और वह उसके पास बार बार आती और कहती,‘देख, मुझे मेरे प्रति किए गए अन्याय के विरुद्ध न्याय मिलना ही चाहिये।’ सो एक लम्बे समय तक तो वह न्यायाधीश आनाकानी करता रहा पर आखिरकार उसने अपने मन में सोचा,‘न तो मैं परमेश्वर से डरता हूँ और न लोगों की परवाह करता हूँ। तो भी क्योंकि इस विधवा ने मेरे कान खा डाले हैं, सो मैं देखूँगा कि उसे न्याय मिल जाये ताकि यह मेरे पास बार-बार आकर कहीं मुझे ही न थका डाले।'’” -लूका १८:२-५
फिर यीशु ने कहा,
“'देखो उस दुष्ट न्यायाधीश ने क्या कहा था। सो क्या परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों पर ध्यान नहीं देगा कि उन्हें, जो उसे रात दिन पुकारते रहते हैं, न्याय मिले? क्या वह उनकी सहायता करने में देर लगायेगा? मैं तुमसे कहता हूँ कि वह देखेगा कि उन्हें न्याय मिल चुका है और शीघ्र ही मिल चुका है।'" -लूका १८:६-८
आपने देखा कि कैसे यीशु इस कहानी में बहस को बनाता है? यदि एक दुष्ट न्यायधीश एक स्त्री कि प्रार्थना को सुन लेता है जो उसे परेशान किये हुए थी, तो एक अच्छा और दयालू परमेश्वर उनके लिए क्या कुछ ना करेगा जिनसे वह उत्साहपूर्वक प्रेम करता है? यदि एक कमज़ोर और भ्रष्ट व्यक्ति गुस्से में आकर किसी कि मांग को पूरा कर सकता है, तो एक परमेश्वर जो सब बातों में प्रथम है, वह अपने बच्चों के लिए क्या कुछ ना करेग?
यह याद रखना ज़रूरी है कि, यह पद यीशु के आने के विषय में सबसे पहली हैं, क्यूंकि वह वक़्त होगा जब सब कुछ सही हो जाएगा। सब प्रकार के अन्याय और गलत बातें बदल जाएंगी, और परमेश्वर उन्हें नया कर देगा। इस सबके लिए गम्भीरता के साथ प्रार्थना करना सही होगा।
यह हर एक अन्याय और कष्ट जो इस पृथ्वी पर उसके पीछे चलने वालों को सहना पड़ रहा है, उन पर लागू होता है। उसके चुने हुओं को हार नहीं माननी चाहिए! वे अपने पिता को पुकार सकते हैं, यह जानते हुए कि वह एक ज़िद्दी और मतलबी किस्म का न्यायधीश नहीं है। वह उनकी प्रार्थनाओं को सुनेगा! वह अपने लोगों को श्राप के कष्टों से छुटकारा देने में खुश होता है! जितना कि हम चाहते हैं उससे बढ़ कर परमेश्वर अपनी सहायता को और समय के लिए लाना चाहता है। कभी ऐसे दिन होते हैं जब हमें लगता है कि हमारी प्रार्थना सुनी नहीं गयी है। और कुछ बातों के लिए, हमें तब तक प्रतीक्षा करना होगा जब हम स्वर्ग में यीशु के साथ वह पूरी चंगाई को देख सकेंगे और न्याय को पा सकेंगे। परन्तु वे जो विश्वास में लगे रहेंगे वे परमेश्वर के छुटकारे को देखेंगे!
जब यीशु ने इस कहानी को समाप्त किया उसने पूछा,"'फिर भी जब मनुष्य का पुत्र आयेगा तो क्या वह इस धरती पर विश्वास को पायेगा?'” आपको क्या लगता उसने यह सवाल क्यूँ पुछा होगा? क्या आपको लगता है कि वह चिंतित है? आपको लगता है कि शायद एक भी विश्वासी जन उसके आने पर नहीं बचेगा? वह ऐसा क्यूँ पूछेगा?
यीशु एक चुनौती दे रहा था। उसके आने कि घड़ी को कोई नहीं जानता। वह कल हो सकता है। एक सौ साल बाद भी हो सकता है। परन्तु हर एक पीढ़ी को इस तरह जीना और प्रार्थना करना चाहिए मानो वह कल ही आ रहा हो, क्यूंकि जब वह आएगा, वह उन्हें ढूंढेगा जो अपने महान राजा वफादार रहे। हम यीशु के प्रशन्न को इस तरह पढ़ें,"जब मैं आऊंगा, क्या मैं तुम्हे वफादार पाऊंगा?"
यीशु ने अपने कुछ दृष्टान्तों से दिखाया कि कैसे हमें उसके पास आना है। यीशु के समय में, एक विधवा एक बहुत ही भेद्य स्त्री हुआ करती थी। उसकि देखभाल करने के लिए और उसे उन लालची और पापी पुरुषों से बचाने के लिए उसके पास उसका पति नहीं था। लेकिन जब हम एक मज़बूत विधवा को देखते हैं जो बार बार उस न्यायधीश के पास जाती है, तो एक अलग ही तस्वीर देखने को मिलती हैं। वह विधवा बिना समाधान के नहीं थी। वह कुछ कर सकती थी और उसने कर दिखाया। वह उस व्यक्ति के पास गयी जिसे न्याय दिलाना ही चाहिए, और उसने उससे मांग की। विधवा स्त्री कि यह एक ऐसी तस्वीर है जो भेद्य है। लेकिन एक है जिसके पास हम जा सकते हैं। वास्तव में, हमें उसके पास जाना ही चाहिए। वही हमारी उम्मीद और भरोसा है। सबसे बड़ा फर्क यह है कि स्वर्ग में हमारा न्यायधीश हमसे प्रेम करता है और ठहरा रहता है कि हमें कब न्याय और शांति दे। हम प्रार्थना में उसके सिंहासन के पास पूरी स्वतन्त्रता और भरोसे के साथ आ सकते हैं!
उस विध्वा कि कहानी बताने के बाद, यीशु ने एक दृष्टान्त बताया। इस बार, वह दो व्यक्तियों का उदहारण देता है जो प्रार्थना करते हैं। उनमें से एक, उस विधवा के समान विनम्रता के साथ आता है। और दूसरा एक अलग रवैया ले कर आता है। वह एक अप्रिय इंसान है। एक समस्या यह है कि, हर मनुष्य के ह्रदय में यह आज़माईश होती है कि उसके समान बनें! क्या कहते हैं:
“"मन्दिर में दो व्यक्ति प्रार्थना करने गये, एक फ़रीसी था और दूसरा कर वसूलने वाला। वह फ़रीसी अलग खड़ा होकर यह प्रार्थना करने लगा,‘हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि मैं दूसरे लोगों जैसा डाकू, ठग और व्यभिचारी नहीं हूँ और न ही इस कर वसूलने वाले जैसा हूँ। मैं सप्ताह में दो बार उपवास रखता हूँ और अपनी समूची आय का दसवाँ भाग दान देता हूँ।'’"
यह व्यक्ति कितना धार्मिक लगता है। यीशु ने दुसरे व्यक्ति के विषय में यह कहा,
“'किन्तु वह कर वसूलने वाला जो दूर खड़ा था और यहाँ तक कि स्वर्ग की ओर अपनी आँखें तक नहीं उठा रहा था, अपनी छाती पीटते हुए बोला,‘हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर।’"
कौन से व्यक्ति के साथ यीशु ने सहमति दिखाई? वह किसे एक ज़यादा बुरा उदारहण समझता है? उसने कहा,
"'मैं तुम्हें बताता हूँ, यही मनुष्य नेक ठहराया जाकर अपने घर लौटा, न कि वह दूसरा। क्योंकि हर वह व्यक्ति जो अपने आप को बड़ा समझेगा, उसे छोटा बना दिया जायेगा और जो अपने आप को दीन मानेगा, उसे बड़ा बना दिया जायेगा।'”
चेलों को झटका लगा। क्या? इस्राएल में, चुंगी लेने वाले को सबसे नीच व्यक्ति माना जाता था। साधारण यहूदी उसके साथ भोजन भी नहीं करते हैं। परन्तु एक फरीसी बहुत ही इज़ज़द्दार माना जाता है! उनके सारे यहूदी तरीके परमेश्वर के तरीकों से विपरीत थे!
यीशु ने कहा कि मनुष्य का परमेश्वर के पास नम्रता के साथ आना ही उसे पसंद है चाहे वह कितना भी पापी हो। फरीसी का परमेश्वर के पास हेकड़ी के साथ आना एक बहुत बड़ा अपराध था। उन्होंने प्रार्थना को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग किया, जबकि वह एक पवित्र भेंट है जो हमें अपने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के समक्ष लाना होता है। और वह घमंड आम तौर पर शांत विचारों से नहीं संतुष्ट होता है। घमंडी व्यक्ति चाहता है कि दुसरे उसके प्रधानता के आगे झुंके। यह ना केवल दूसरों के महत्त्व को कम करता है, बल्कि वे चाहते हैं कि वे उनकी महानता के समाने अपने आप को कम समझें। फरीसी परमेश्वर कि वस्तुओं का उपयोग करके लोगों के समाने अपने आप को छोटे ईश्वर बनके ऊँचा दिखाते थे।
लेकिन, हमारे जीवन कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, यदि हम अपने आप को परमेश्वर के आगे सही रीति से पेश करते हैं या नहीं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि सही रहे। इस कहानी में, फरीसी परमेश्वर को आराधना और प्रेम से भर के प्रार्थना नहीं कर रहा था। वह वास्तव में अपने आप कि आराधना कर रहा था, और उसका दुसरे पापियों के प्रति प्रतियोगिता करने का गुस्सा, यह प्रदर्शित करता था कि उसे परमेश्वर के बच्चों के लिए कोई परवाह नहीं थी। वह सब गलत कारणों के लिए सही चीज़ करता था। चुंगी लेने वाले व्यक्ति के पास दूसरों पर न्याय करने या उन्हें दोषी ठहराने का समय नहीं था। वह परमेश्वर के आगे अपने पश्चाताप कि चाहत को लेकर आता रहा। इससे परमेश्वर खुश होता है, और परमेश्वर के वचन का आज्ञापालन करने का यही सही तरीका है!