कहानी ६६: पहाड़ पर उपदेश - दोनों सदन

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कहानी ६६: पहाड़ पर उपदेश - दोनों सदन

मत्ती ने एक शिष्य होने का मतलब सिखाने के लिए पहाड़ पर के उपदेश को लिखा। अंतिम तीन तस्वीरों में जो यीशु दिखता है, वह उन लोगों को जो स्वर्ग राज्य के सदस्य हैं और वे जो नहीं हैं उन दोनों में अंतर। सच्चे विश्वासी चौड़े द्वार से नहीं जाएंगे। वे सकरे द्वार से आएंगे। वे झूठे नबी नहीं होंगे, लेकिन अच्छा फल लाएंगे। उसके अंतिम तस्वीर में, यीशु समझते हैं कि बहुत से परमेश्वर के वचन को सुनेंगे और सहमत होंगे, परन्तु सब उसे नहीं मानेंगे। यीशु ने  ऐसा कहा ,

“इसलिये जो कोई भी मेरे इन शब्दों को सुनता है और इन पर चलता है उसकी तुलना उस बुद्धिमान मनुष्य से होगी जिसने अपना मकान चट्टान पर बनाया, वर्षा हुई, बाढ़ आयी, आँधियाँ चलीं और यह सब उस मकान से टकराये पर वह गिरा नहीं। क्योंकि उसकी नींव चट्टान पर रखी गयी थी।'"    मत्ती ७ः२४-२५

इस छोटी सी कहानी में, चट्टान कौन है? यह यीशु का शिक्षण है! यह परमेश्वर का वचन है! यह पहाड़ पर का उपदेश है! परमेश्वर कि भलाइयों को देखना आसान है और उनके विषय में बात करना भी। उन पर अमल करना ज़यादा कठिन है। अपने गौरव को नष्ट करना और दुसरे से नम्रता दया के साथ बात करना बहुत दर्दनाक है। खुशी से इनकार करना स्वयं को शुद्ध रखना बहुत असुविधाजनक है।लेकिन दिल के उन क्षणिक छोटे निर्णयों में हम यीशु को अपने ऊपर चुनते हैं। और प्रत्येक आज्ञाकारिता के साथ, हम उसे में मजबूत होते जाते हैं। यह एक मजबूत चट्टान है जो हमे जीवन में बहुत सामर्थी नीव के समान है। हम ऐसे घर को बना रहे हैं जो स्थिर रहेगा! जब कठिन समय आते हैं, ये नीव हमें मज़बूत रखेगी ताकि हम कठिनाई से नष्ट न हो जाएं।

“किन्तु वह जो मेरे शब्दों को सुनता है पर उन पर आचरण नहीं करता, उस मूर्ख मनुष्य के समान है जिसने अपना घर रेत पर बनाया। वर्षा हुई, बाढ़ आयी, आँधियाँ चलीं और उस मकान से टकराईं, जिससे वह मकान पूरी तरह ढह गया।”                                                                                                                                 मत्ती ७ः२६-२७

यीशु ने गंभीरता से चेतावनी दी कि उसके शब्दों को सुनने और यहां तक ​​कि उनमें से अनुमोदन करने के लिए पर्याप्त नहीं है। एक आदमी की कल्पना कीजिये जो अपने परिवार के लिए अपने घर का निर्माण करता है। वह दुकान में जाता है और घर की नींव बनाने के लिए बड़े, चपटी चट्टानों को देखता है जो घर कि नीव के लिए काम अति हैं। अन्य बिल्डर उसे बताते हैं कि, "ये चट्टाने महंगी हो सकती है, लेकिन वे खरीदने लायक होंगी। आपका घर सुरक्षित और मजबूत रहेगा और आपकी दीवारें नहीं हिलेंगी।" वो व्यक्ति कुछ चट्टानों को उठाता है उन्हें देखता है, और खता है कि वे कितनी मज़बूत हैं। लेकिन वह उन्हें नहीं खरीदता है। वे संघर्ष करने के लिए बहुत ज्यादा हैं। वह वापस चला जाता है और अपनी भूमि के रेत पर कुछ दीवारों को बनाता है। वह शीर्ष पर एक छत डालता है और अपने परिवार को उसके अंदर ले आता है। वह पूरे समय यही बात करता रहता है कि वह चट्टानें कितनी महान हैं। वह लोगों को बताएगा कि उसने चट्टानों कघर बनाने के लिए इस्तेमाल किया। लेकिन जब ज़बरदस्त बारिश आती है, तो सब को पता चल जाएगा। जब घर गिरेगा, तब सरे पड़ोसियों को पतगा चल जाएगा कि चट्टानें थी ही नहीं।

परमेश्वर के उज्जवल और पवित्र विचारों को सुनना और उनसे सहमत होना बहुत आसान है। कौन कहेगा कि विनम्रता बुरी है? बहुत कम ऐसे लोग होंगे जो कहेंगे कि नम्रता बुरा विचार है! पूरी दुनिया में लोग इतिहास के महान शांति बनानेवलों का भय मानते हैं। लेकिन वास्तव में हमारे अपने जीवन में मूल्य का भुगतान करना एक बहुत अलग बात है। यह हमारे दिल में क्रोध या वासना या लालच का आनंद लेना बहुत आसान है! पहाड़ पर के उपदेश में, यीशु ने अपने शिष्यों को एक महाकाव्य चुनौती जारी किया। क्या वे उसके उच्च और पवित्र रास्तों पर गहराई से देखेंगे और अपने स्वयं के जीवन के लिए एक नींव रखना शुरू करेंगे? क्या वे परमेश्वर के राज्य के नागरिक कि योग्यता में होकर कार्य करेंगे ?